शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

उत्कल या उड़िया शब्द से समाज हो रहा गुमराह

               हजारो वर्षों से बहीस्कृत, अधिकारों से वंचित तथा समाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनैतिक रूप से पिछड़े गांड़ा समाज के उपर ‘‘उत्कल’’ शब्द का आवरण से पूरा समाज गुमराह हो गया। ऐसा माना जाता है कि 60-70 के दशक में झुग्गी बस्तियों के तोड़फोड़ को लेकर रैली एवं धरना प्रदर्शन के दौरान संबोधन के रूप में मिडिया ने पहली बार ‘‘उत्कल’’ शब्द आवरण के रूप में सामने आया था। अज्ञानता में गांड़ा समाज के लोगों के द्वारा अपने आपको उत्कल समाज समझा जाना बहुत बड़ी भूल थी, पूर्व के लोगों के द्वारा गांड़ा समाज को उत्कल समाज के नाम से सम्बोधन किये जाने से समाज का मूल स्वरूप ही बिगड़ गया। 
            हाला की 50 के दशक में जातियों का छुआ-छुत इतना चरमसीमा पर था, कि अछुत लोगों को किसी प्रकार के काम पर नही रखा जाता था रोजी रोटी को लेकर सबके सामने विकराल समस्या खड़ी थी जिसके कारण जाति के उपनामों में भी काफी परिवर्तन हुआ। किन्तु समाज के लिए जब संस्था संगठन बनाने का दौर चला उस शुरूवाती दौर में ही गांड़ा समाज के नाम से सांगठनिक ढांचा समाज के विकास के लिए खड़ा कर दिया गया होता तो आज समाज गुमराह नहीं हुआ होता। समाज मुल स्वरूप में ही संगठित रहता। इस संबंध में उस दशक के समाजिक कार्यकर्ता श्री युधिष्ठिर जगत बताते है कि उस समय गांड़ा जाति के नाम से समाजिक कार्य करना बहुत कठिन कार्य था क्योंकि हमारे अपने लोग ही गांड़ा शब्द का उपयोग करने पर विरोध करते थे। यहां तक कि बच्चों को स्कुल दाखिला में गांड़ा जाति लिखवाने पर रोकते थे। क्योंकि हमारे समाज के लोग उस समय रजनीति दल से जुड़ना शुरू कर रहे थे उनके सानिध्य में आकर ही गांड़ा शब्द का विरोध कर रहे थे। किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़कर उनके लिए कार्य करना को वे समाजसेवा समझते थे इन्ही राजनीति से प्रेरित लोगों ने ही अपने निजी स्वार्थ के लिए समाज को संगठित नही होने दिया तथा अपना राजनिती स्वार्थ की पूर्ति करने के लिये 8-10 लोग इकट्ठे हो गये, ‘उत्कल’ शब्द का उपयोग कर एक समिति बना लिया, उसमें अपने नेता के लिए एक राजनीतिक कार्यक्रम कर दिया और उसके बाद वे हो गये नेता, समाज के ही कथाकथित नेताओ ने समाज को डाहलागाय जैसे उपयोग किया। और कभी एक मंच पर संगठित होने नही दिया। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निवास करने वाला विशाल काय गांड़ा समाज ‘‘उत्कल’’ के नाम से छला गया, तथा इस समाज का बाहुल्यता का लाभ उन लोगों को मिला जिनका जातिगत रूप से गांड़ा समाज का कोई सरोकार नहीं है। 
               जाने अनजाने मे 87-88 में प्रथम वार सांस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से उत्कल दिवस का आयोजन कर समाज को एक स्थान पर एकत्रित करके एकता करने के लिए एक सार्थक प्रयास हुआ था किन्तु आज वहीं उत्कल दिवस का स्वरूप इस तरह से बिगड़ा कि आज एक राजनैतिक अखाड़ा बन कर रह गया है क्योंकि उत्कल दिवस एक तिथि विषेष पर निर्धारित है इस लिए लोग सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने जुटते है किन्तु इस कार्यक्रम को माध्यम बनाकर स्वार्थी तत्वों ने भरपूर लाभ उठाया किन्तु समाज को आज तक किसी तरह का कोई लाभ नही हुई जिसकी कारण उत्कल दिवस समाज के लिए औचित विहीन हो गया है। जिस उडिसा प्रांत से भुखमरी के कारण गांड़ा जाति के लोगों को विभिन्न राज्यों में पलायन करना पड़ा उस उडिसा राज्य की स्थापना पर उत्कल दिवस छत्तीसगढ़ में निवास करने वाले गांड़ा जाति के लोगों के लिए निरर्थक है। 

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