बुधवार, 23 नवंबर 2016

भौगौलिक विभाजन बना गांड़ा समाज के पिछड़ेपन का कारण


    गांड़ा समाज का इतिहास खंगालने पर हमारे समाज के संबंध में उपलब्ध जानकारी के अनुसार संपूर्ण भारत वर्ष में निवासरत गांड़ा समुदाय कि उत्पत्ति अखंड भारत के कोशल राज्य से हुआ है। जो अभी वर्तमान में पष्चिम उड़िसा और छत्तीसगढ़ की सीमाओं में विभाजित है। हमारे समाज के लोग ओड़िसा-छत्तीसगढ़ के रायगढ़, महासमुदं, गरियाबंद, कोंडागांव, बस्तर, सुकमा के सीमा जिलों में लाखों की संख्या में निवासरत है, ओड़िसा तथा छत्तीसगढ़ की भाषा, कला-संस्कृति, परंपराये आपस में एक है एवं आपस में रोटी-बेटी का आदान प्रदान भी है। गांड़ा समुदाय का काम मुख्यतः किसानी करना, कपड़ा बुनना एवं बाजा बजाना रहा है। आमतौर पर गांव की व्यवस्था के लिये बनाये गये तीन पदों में -गोंटीया, झाकर और गांड़ा में मुख्य रूप से गांड़ा का कार्य गांव का क्षेत्र रक्षण एवं सूचनाओं का आदान-प्रदान करना रहा है। गांड़ा गांव के लिए गरिमामय पद है जिसे ओड़िसा में आज भी गांव के गांड़ा को सम्मान के साथ संबोधित किया जाता है तथा गांव के गांड़ा को उड़िसा में चैकीदार एवं छत्तीसगढ़ में कोटवार के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ में निवासरत गांड़ा समाज पष्चिम उड़िसा का प्रवासी उडिया नही, बल्कि अखंड भारत के कोषल राज्य का मूल निवासी है अर्थात् छत्तीसगढ़ के मूलनिवासी है।
कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने ई.पूर्व 475 के दौरान आनंद को धम्म उपदेश देने सिरपुर भेजा था। तथा सोमवंशी शासकों के काल में सिरपुर दक्षिण कोशल कि राजधानी थी। इतिहासकारों के अनुसार ई.पूर्व. सदी में तथागत बुद्ध यहां वर्षावास बिताकर दक्षिण कोशल को अपना कार्यक्षेत्र बनाया था उस समय टिटलागढ़ नामक स्थान जो अभी उड़िसा के बलांगीर जिले में है वह प्राचीनकाल में दक्षिण कोशल का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र हुआ करता था। इस कालखंड में गांड़ा समुदाय का एक गौरवशाली इतिहास मिलता है। आधुनिक काल में कोशल प्रदेश का राज्यों में विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ और उड़िसा का जो सीमांकन हुआ उसमें गांड़ा समुदाय का भी भगौलिक सीमांकन हुआ, और हमारे पूर्वज जो छत्तीसगढ़ में रह गये वे छत्तीसगढ़ी हो गये, और जो ओड़िसा में रह गये वे उड़िया हो गये। छत्तीसगढ़ में हमारा समाज - चैहान, देवदास, गंधर्व, हरपाल आदि उपनामों से भी जाने जाते है, तथा बाजा बजाना, गीत संगीत व नाट्य जैसे उत्कृष्ट कला और संस्कृति में पारंगत गाड़ा समुदाय के लोगों को छत्तीसगढ़ में उत्कल समाज भी कहा जाता है। क्योंकि उत्कृष्ट कला एवं संस्कृति से परिपूर्ण क्षेत्र को कलांतर में उत्कल कहा जाता था। तब अभिवाजित बंगाल-उड़िसा के पुर्वी क्षेत्र को आयकन, उत्कल, ओड्रो, कलिंग जैसे अलग-अलग नामों से अलग-अलग समय में संबोधित किया जाता रहा है और अभी उड़िसा का वर्तमान नाम ओडिसा है। मध्यप्रदेश से अलग हुए छत्तीसगढ़ का दक्षिण पूर्वी भाग - रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और रायगढ़ का भू-भाग जो आज वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य में सम्मिलित है तथा उड़िसा का पश्चिम भाग- संबलपुर, बलांगीर, कालाहांडी, नुआपाड़ा आदि जिलों को प्राचीन काल में कोशल तथा दक्षिण कोशल कहा जाता था। परंतु इन प्रदेशों कि सीमाओं में समय≤ पर परिवर्तन भी होता रहा, जैसे- देश के आजादी के पूर्व बंगाल के कुछ क्षेत्र को अलग कर 01 अप्रैल सन् 1936 को उड़िसा प्रांत का गठन हुआ  तब अग्रेज शासन में सी.पी.एड बरार का राज्य था जिसके अंतर्गत चारा राज्य जैसे महाराष्ट्र, मध्यप्रदेष, छत्तीसगढ़ तथा उड़िसा का क्षेत्र आते थे उस कार्यकाल में गांड़ा जाति का विस्तार है।  सन् 1947 में देश आजाद होने के बाद भी सन् 1950 में नागपुर से संबलपुर तक सी.पी.एन्ड बरार राज्य का कमिश्नरी थ। तथा रायपुर-जिला में उड़िसा के पश्चिम भाग के हमारे पूर्वज उस समय बैलगाड़ी से लगान पटाने रायपुर आते थे। देष के विभिन्न राज्यों का जब विभाजन किया गया तब महाराष्ट्र से अलग कर 01 नवंबर सन् 1956 को मध्यप्रदेश का गठन किया गया तथा 01 नवंबर सन् 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ। किंतु ऐसा कहा जाता है कि उड़िसा प्रांत का पृथक से राज्य के रूप में गठन होने के बाद भी अनुसूचित जाति के बाहुल्यता वाले पश्चिम उड़िसा के क्षेत्र को वहां के शासक वर्गो ने हदय से नही अपनाया तथा हमेषा उपेक्षित रखा। लगातार अकाल- सूखा जैसे विभिन्न आपदाओं से यह क्षेत्र ग्रसित रहा जिस कारण यह क्षेत्र पूर्णतः पिछड़ गया। उपर से जातःपात एवं छुआछूत के द्वंस ने इस कदर समाज को तोड़कर रख दिया की लाचारी और भूखमरी तक नौबत आ गई, सन् 1965 के भीषण अकाल ने गांड़ा जाति के लोगों को रोजी रोटी कि तलाश में विभिन्न राज्यों में जाने को विवश कर दिया। जिससे छत्तीसगढ़ के शहरी क्षेत्रों में रोजगार के सुलभ साधन उपलब्ध होने के कारण ज्यादातर लोग गांव से आकर शहरों में बस गए एवं जिसको आषानी से जो काम मिला वह करके अपने परिवार का पालन-पोषण करने लगे। जैसे कालातंर में दक्षिण कोशल का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र टिटिलागढ़ था, जो अभी ओड़िसा में है। वैसे ही पष्चिम ओड़िसा का व्यापारिक केन्द्र रायपुर था, जो अभी छत्तीसगढ़ में है इस तरह से कालांतर के  कोशल राज्य के अविभाज्य सीमाओं के दृष्टिकोण से गांड़ा समुदाय कोशल राज्य का मुल निवासी होने के कारण छत्तीसगढ़ का सम्पूर्ण क्षेत्र गांड़ा समाज का अभिन्न अंग है। भारत शासन के जाति अनुसूची में गांड़ा जाति मध्यप्रदेश में -25, महाराष्ट्र में -21, ओडिसा में-29 तथा छत्तीसगढ़ में- 24 वे सूची में शामिल है।  छत्तीसगढ़ राज्य में घोषित 44 अनुसूचित जातियों कि जनसंख्या 32 लाख है जो राज्य की कुल जनसंख्या का 12.8 प्रतिशत है एवं संपूर्ण छत्तीसगढ़ में गांड़ा समाज कि जनसंख्या अनुमानित लगभग 15 लाख है जो छत्तीसगढ़ के 12 जिलों में निवासरत है तथा अनुसूचित जाति के विकास के लिए शासन के द्वारा कई प्रयोजन किये गये है जैसे अनुसूचित जाति विकास विभाग, अंतव्यवसायी विकास निगम, अनुसूचित जाति प्राधिकरण, त्वरित न्याय के लिए अनुसूचित जाति आयोग का गठन किया गया है किन्तु जाति प्रमाण पत्र के आभाव में इन विभागों से मिलने वाले लाभ से समाज वंचित है। इस समाज को छत्तीसगढ़ प्रदेश में जाति प्रमाण पत्र का आसानी से न मिलना एक विडम्बना है जिसके कारण आजादी के 70 वे, दशक में भी अपने मौलिक एवं संवैधानिक अधिकारों से वंचित हो रहा है तथा सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अवसरों के लिए समाज आज भी संघर्ष कर रहा है। 
छत्तीसगढ़ में उत्कल समाज के नाम से पहचाने जाने वाले गांड़ा समुदाय का अपना कोई एक सर्वमान्य संगठन एवं सर्वमान्य मुखिया नही होने के कारण समाज का अस्तित्व सांगठनिक एवं नेतृत्व के दृष्टिकोण से औचित्यहीन रहा है। जिस कारण समाज का स्वयं की अपनी कोई पहचान नहीं थी, किन्तु सर्व सम्मिति से समाज का केन्द्रीय संस्था के रूप में गांड़ा महासभा का गठन होने के बाद समाज में एक आशा की किरण जागी है, क्योंकि महासभा की दुरदृष्टी इस बात से साबित होती है कि आने वाले 15 सालों में वर्ष 2030 तक गांड़ा समाज को एक आदर्श समाज के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य बनाया गया है। ताकी गांड़ा समाज भी अन्य विकसित समाज के समकक्ष खड़ा हो कर स्वाभिमान से जी सकेगा। गांड़ा महासभा के गठन होने के पूर्व जितने की गांड़ा समाज के लोग उत्कल शब्द का उपयोग करके संस्था, समिती, संगठन चला रहे थे, अब उन्हे समाज की एकता के लिए अपना निजी एवं राजनितिक स्वार्थ को छोड़कर महासभा में शामिल होकर काम करना चाहिए ताकि मिषन आदर्ष समाज की स्थापना के लक्ष्य को वर्ष 2030 तक आसानी से पा सकेगें यह सम्पूर्ण समाज के लोगों के सहयोग से ही संभव है।